Friday, June 22, 2018

संगीत के "सूरमा" सुखविंदर पा जी.

सुखविंदर सिंह वो नाम है जिसने सारी दुनिया में भारत का गौरव बढाया है. छैयां छैयां के सूफी कलाम से लेकर जय हो के ऑस्कर तक हर जगह अपनी पुरसरार आवाज़ और दमदार गायकी से फ़तेह का झंडा गाढ़ा है. हर जगह साबित किया है के वो आला दर्जे के फनकार हैं. मगर कितना मुश्किल है इस ऊंचाई को पाना.

एक बड़ा कलाकार वो है जो अपनी कला में इतना खोया हो के उसे सिवाए कला के कुछ और याद ही न हो. सुखविंदर पा जी भी ऐसे ही हैं. बीते दिनों जब उनसे बात हुयी तो मैंने उनको उनके नए गाने के लिए बधाई दी, उनका रिएक्शन था “कौनसा गाना ब्रदर”. मैंने उन्हें बताया के मैं हाल ही में आये उनके एक गीत की बात कर रहा हूँ. तब उन्होंने उसे सुना और याद करते हुए कहा “हाँ हाँ अरे ये तो मैंने ही गाया है.”  ये किसी भी कलाकार की कला का वो दर्जा है जिसमें वो सारी दुनिया को भूल जाता है, यहाँ तक के ख़ुद अपने आपको भी. सुखविंदर पा जी उस आर्किटेक्ट की तरह हैं जो एक से बढ़कर एक नफीस महल बनाता है और दुनिया को देकर भूल जाता है. या यूँ कह लीजिये के शहंशाह बख्शीशों का और दरवेश दुआओं का हिसाब नहीं रखते. 

ये तस्वीर उसी यादगार रिकॉर्डिंग की है.
मैंने सुखविंदर पा जी के साथ तकरीबन 8 गाने रिकॉर्ड किये हैं. मगर बदकिस्मती से अभी एक गीत ही रिलीज़ हुआ है. उनके साथ एक गीत की रिकॉर्डिंग के वक़्त उनकी बेमिसाल गायकी का जलवा मुझे देखने को मिला. उन्होंने गाते गाते ही मुझ से धुन के बारे में पूछा मैंने कहा बहुत अच्छी लग रही है, थोड़ी थोड़ी अरेबिक स्टाइल भी टच हो रही है. अचानक बोले “वाह बढ़िया अब इसको अरेबिक स्टाइल में ही गायेंगे.” और फ़ौरन बीट चेंज कर के उन्होंने इजिप्शियन अरेबिक अज़ान की तरह का स्वर लगा दिया. मेरे बदन का रुआं रुआं हरारत में आ गया. यूँ महसूस हुआ जैसे मैं eygept के रिग्स्तान में खड़ा हूँ और अज़ान हो रही है. बिना किसी रिहर्स या प्रेप के उन्होंने इन्स्टेंटली ये कमाल किया था. वो गाये जा रहे थे और मैं बैठा सुन रहा था और उस लम्हा मेरे ज़हन में फ़ारसी की एक कहावत गूँज रही थी..
ईं सआदत ब-ज़ोरे बाज़ू नेस्त,
ता न बख़शद, ख़ुदाये बख़शिंदह.
यानी,
ये वो ख़ुशी नहीं जिसे बाज़ुओं के ज़ोर से (ताक़त से) हासिल किया जा सके, यानी क़ब्ज़ा किया जा सके या जीता जा सके.
ये तो वो कमाल है के, जब तक ख़ुदा ही ना बख़्श दे, नहीं मिलता.
संजू, और सूरमा के गीतों के लिए मुबारकबाद पा, जी.   

     

Sunday, June 17, 2018

ईद का तोहफा



सभी दोस्तों को आदाब,

दरवेश हो फ़कीर हो, जोगी हो, या आर्टिस्ट हो,  फितरतन अपने जैसे ही लोगों को ढूंढते हैं, लिहाज़ा मौका मिलते ही शहर के एक आर्ट हब में जाकर बैठ जाता हूँ. बहुत से अपने ही जैसे ऊटपटांग लोग दिखाई देते हैं. अक्सर उनमें से बर्बाद हैं. वो आयुष भाई कहते हैं ना के राइटर का ईगो हाथी से भी बड़ा होता है, या यूँ कहिये के आर्टिस्ट का ईगो ब्लू व्हेल से भी बड़ा होता है. लिहाज़ा  कुछ अपनी ख़ुदपरस्ती से बर्बाद हैं, कुछ अपनी नासमझी से. बहरहाल वहीँ एक स्केच आर्टिस्ट से सामना हो गया. किसी बात पर मेनेजर से झगड़ रहे थे. सुना है उस रात मेनेजर के घर पहुँच कर धमकी भी दे डाली. नाम समर्थ भाई है मगर कोई उन्हें बाबा बुलाता है, कोई हुक़म, कोई "बना जी" और कुछ तो उन्हें "जिन्ना" भी बुलाते हैं (शायद इसलिए के उनके विचार किसी से मिलते ही नहीं).  किसी पुरानी रियासत के रईस हैं. रजवाड़े रियासत रहे नहीं, घरवाले, रियासत जाते ही सियासत में आ गए. मगर ये भाई सियासत से बहुत दूर, अपनी बनायीं रियासत में रहते हैं. कूची कलम उठाये, रंग बिखराए, काग़ज़ पर तस्वीरें उकेरते रहते हैं. तबियत से एक दम फक्कड़, फ़कीर. लम्बी दाढ़ी, सिर पे रजवाड़ों की पगड़ी, लम्बा कुरता, बगल में झोला, झोले में रंग के अलावा ढेरों अगरबत्तियां के झोला खुलते ही ख़ुशबू महक जाए, रूस का डेड सी कहे जाने वाले अराल लेक के छोटे छोटे गोल गोल पत्थर, और धूनी रमाने का सामान. दिन में 4 बार गांजे के कश ले लेते हैं, जो खिलाओ खा लेते हैं, और पेंटिंग करते हुए  मोबाइल के स्पीकर पे अमीर ख़ुसरो की लिखी सूफी कव्वालियाँ सुनते रहते हैं. बीच बीच में चिल्लाते भी हैं.. "आह...........आह............" फिर छोटा सा, "वा....!!!"
मैं अपनी टेबल पर बैठता हूँ,  लिखना शुरू करता हूँ, और आर्डर प्लेस करते हुए एक कप चाए उनकी टेबल पर भिजवा देता हूँ.  वो दूर से सिर हिलाकर कहते हैं "असीम मियाँ" असीम मियाँ".. बस फिर वापस क़व्वाली में मगन, पेंटिंग में सर घुसा लेते हैं.

कुछ एक बातों से मालूम हुआ के दिन भर स्केच और पेंट में लगे रहते हैं और अक्सर अपनी तस्वीरों को अपने चुनिन्दा क्लाइंट्स को बेच देते हैं. कह रहे थे एक सीरिज़ बिक जाये तो 3 महीने का ख़र्च दे जाती है.पर इन दिनों हालात अच्छे नहीं हैं. काफी वक़्त से कुछ भी नहीं बिका शायद. मगर वो रोज़ लगे रहते हैं.

ईद से एक दिन पहले की बात है, मैं हस्ब ए मामूल लिख रहा था, वो दिन भर से पेंटिंग कर रहे थे, रात को जाते वक़्त मेरे पास आये और दिन भर के बनाए स्केच मेरे सामने रख दिए. मैंने तारीफ की, तो बोले "तुम्हारे लिए बनाया है मियाँ... ईद का तोहफा है, रख लो."



मैं झटका खा गया, मैंने कहा भाई ये अगर बिक जायेंगे तो आपकी प्रॉब्लम हल हो जाएगी, आप इसे क्लाइंट को भेजो, मेरे लिए वोही तोहफा होगा, उन पैसों से पार्टी करेंगे.
समर्थ भाई ज़ोर देकर बोले "असीम  मियाँ, तुम अच्छे आदमी हो, तुम्हारे लिए बनाया है, ईद का तोहफा है, रख लो" और झोला उठाया और चले गए. मैं कुछ कह ही नहीं पाया.

ईद के दिन मेरे घर आने वाले हर मेहमान को मैंने ये तस्वीरें दिखायीं और समर्थ भाई का किस्सा भी सुनाया.
मैं सच कहता हूँ इतना दर्वेशाना तोहफा मुझे पहली दफह मिला है.
             

Saturday, June 16, 2018



दोस्तों के ख़ासे इसरार और मशवरे के बाद ब्लॉग लिखने की तरफ मुतवज्जह हुआ. वैसे ब्लॉग राइटिंग को लेकर कुछ ख़ास जानता नहीं था, मगर जितना कुछ राइटिंग के बारे में जाना समझा है वो आपसे Share करने के लिए ब्लॉग राइटिंग करने की सलाह दे दी गयी. अच्छा अगर ये बात है तो "तुम्हारा हुक़म सर आँखों पर" यारों. ये भी सही. ब्लॉग लिखने बैठ गया. मगर लिखता क्या?  काफी दिनों तक ब्लॉग का नाम ही सोचता रहा. आख़िर को जाकर अदब नवीसी नाम जँच गया.
 
 


फ़ारसी में नवेस्तन के मायेने हैं लिखना, और नवीसी यानी लिखने का हुनर, यानी क्रिएट करना. अदब नवीसी यानी हुआ "लिट्रेचर लिखने का हुनर". अब खजूर अगर सूख भी जाये तो छुहारा बनती है, अदब के समन्दर में यूँ तो हमारी हस्ती ही क्या? लेकिन जितना सा कुछ हमने सीखा सबसे Share करने में हर्ज ही क्या है? 
हिंदी, उर्दू, अरबी, फ़ारसी के अदब के कोहसारों (पहाड़ों) और रेडियो, टी.वी. से लेकर फिल्मों तक जिस पत्थर से टकराए उससे ही कुछ न कुछ सीख का नगीना लेते चले. अब तक की ज़िन्दगी में जो मिला वो आपसे बाँट लेता हूँ. आगे की ज़िन्दगी का अल्लाह मालिक है.