सभी दोस्तों को आदाब,
दरवेश हो फ़कीर हो, जोगी हो, या आर्टिस्ट हो, फितरतन अपने जैसे ही लोगों को ढूंढते हैं, लिहाज़ा मौका मिलते ही शहर के एक आर्ट हब में जाकर बैठ जाता हूँ. बहुत से अपने ही जैसे ऊटपटांग लोग दिखाई देते हैं. अक्सर उनमें से बर्बाद हैं. वो आयुष भाई कहते हैं ना के राइटर का ईगो हाथी से भी बड़ा होता है, या यूँ कहिये के आर्टिस्ट का ईगो ब्लू व्हेल से भी बड़ा होता है. लिहाज़ा कुछ अपनी ख़ुदपरस्ती से बर्बाद हैं, कुछ अपनी नासमझी से. बहरहाल वहीँ एक स्केच आर्टिस्ट से सामना हो गया. किसी बात पर मेनेजर से झगड़ रहे थे. सुना है उस रात मेनेजर के घर पहुँच कर धमकी भी दे डाली. नाम समर्थ भाई है मगर कोई उन्हें बाबा बुलाता है, कोई हुक़म, कोई "बना जी" और कुछ तो उन्हें "जिन्ना" भी बुलाते हैं (शायद इसलिए के उनके विचार किसी से मिलते ही नहीं). किसी पुरानी रियासत के रईस हैं. रजवाड़े रियासत रहे नहीं, घरवाले, रियासत जाते ही सियासत में आ गए. मगर ये भाई सियासत से बहुत दूर, अपनी बनायीं रियासत में रहते हैं. कूची कलम उठाये, रंग बिखराए, काग़ज़ पर तस्वीरें उकेरते रहते हैं. तबियत से एक दम फक्कड़, फ़कीर. लम्बी दाढ़ी, सिर पे रजवाड़ों की पगड़ी, लम्बा कुरता, बगल में झोला, झोले में रंग के अलावा ढेरों अगरबत्तियां के झोला खुलते ही ख़ुशबू महक जाए, रूस का डेड सी कहे जाने वाले अराल लेक के छोटे छोटे गोल गोल पत्थर, और धूनी रमाने का सामान. दिन में 4 बार गांजे के कश ले लेते हैं, जो खिलाओ खा लेते हैं, और पेंटिंग करते हुए मोबाइल के स्पीकर पे अमीर ख़ुसरो की लिखी सूफी कव्वालियाँ सुनते रहते हैं. बीच बीच में चिल्लाते भी हैं.. "आह...........आह............" फिर छोटा सा, "वा....!!!"
मैं अपनी टेबल पर बैठता हूँ, लिखना शुरू करता हूँ, और आर्डर प्लेस करते हुए एक कप चाए उनकी टेबल पर भिजवा देता हूँ. वो दूर से सिर हिलाकर कहते हैं "असीम मियाँ" असीम मियाँ".. बस फिर वापस क़व्वाली में मगन, पेंटिंग में सर घुसा लेते हैं.
कुछ एक बातों से मालूम हुआ के दिन भर स्केच और पेंट में लगे रहते हैं और अक्सर अपनी तस्वीरों को अपने चुनिन्दा क्लाइंट्स को बेच देते हैं. कह रहे थे एक सीरिज़ बिक जाये तो 3 महीने का ख़र्च दे जाती है.पर इन दिनों हालात अच्छे नहीं हैं. काफी वक़्त से कुछ भी नहीं बिका शायद. मगर वो रोज़ लगे रहते हैं.
ईद से एक दिन पहले की बात है, मैं हस्ब ए मामूल लिख रहा था, वो दिन भर से पेंटिंग कर रहे थे, रात को जाते वक़्त मेरे पास आये और दिन भर के बनाए स्केच मेरे सामने रख दिए. मैंने तारीफ की, तो बोले "तुम्हारे लिए बनाया है मियाँ... ईद का तोहफा है, रख लो."
मैं झटका खा गया, मैंने कहा भाई ये अगर बिक जायेंगे तो आपकी प्रॉब्लम हल हो जाएगी, आप इसे क्लाइंट को भेजो, मेरे लिए वोही तोहफा होगा, उन पैसों से पार्टी करेंगे.
समर्थ भाई ज़ोर देकर बोले "असीम मियाँ, तुम अच्छे आदमी हो, तुम्हारे लिए बनाया है, ईद का तोहफा है, रख लो" और झोला उठाया और चले गए. मैं कुछ कह ही नहीं पाया.
ईद के दिन मेरे घर आने वाले हर मेहमान को मैंने ये तस्वीरें दिखायीं और समर्थ भाई का किस्सा भी सुनाया.
मैं सच कहता हूँ इतना दर्वेशाना तोहफा मुझे पहली दफह मिला है.

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